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| आज का इंसान.. |
बहुत कुछ कहने का दिल करता।
आजकल का मौहाल देखकर क्या कहुँ -कहाँ से शरू करुँ-समझ से परे लगता है एक इंसान होने नाते मुझको ये लगता है कि जो आज हमारे मुआशरे में हो रहा है -वह मुमकिन कैसे हो जाता है और फिर सोचने पर मजबूर हो जाती हूँ।
आम इंसा तो गलत को गलत कहने में ज़रा भी देर नहीं करते है और दूसरी तरफ किसी के अच्छे काम को सरहाने में पल भर की देरी किए बिना सर आँखों पर बैढा लेते हैं... फिर हम यह नहीं पूछते कि आप कौन हो ,किस तबक़े को और किस महज़ब के मानने वाले इंसान हो। .. हम बस यह सोचते है कि आप अच्छे हो... इंसान का वज़ूद इसी जज़्बे से बनता है।
अगर यह जज़्बा ही खत्म हों जाएगा तो शायद यह दुनिया इंसानो की बस्ती न हो कर शैतानों की दुनियां में तब्दील हो जाएगी।
इंसान का वज़ूद जंगली जानवर से भी बद्दर बन जायेगा। आज जानवर की मिसाल इंसान से करना भी उसकी तौहीन लगती है... क्योंकि शायद नहीं ,यकीनन जानवर ज्यादा अच्छे -बुरे की परख कर सकता है.. फिर हम क्यों नहीं समझते कि नफरत से सिर्फ बर्बादी के रास्तें गुलज़ार होते है.. मौहब्बतें ज़िंदगी को ऊपर से नीचे तक उस ख़ुशी की खुशबू से सराबोर कर देती हैं जिसकी महक से सारा आलम... चमन बन जाता है।
क्रमश ...


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